अटल जी की वो 10 कविताएं, जो ‘हार नहीं मानने’ की सलाह देते हैं

ATAL-BIHARI-Poems

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अब हमारे बीच नहीं हैं। वाजपेयी पिछले 2 महीनों से किडनी में संक्रमण के कारण एम्‍स में भर्ती थे। दो दिनों तक उन्‍हें लाइफ सपोर्ट सिस्‍टम पर रखा गया, जिसके बाद गुरुवार 16 अगस्‍त की शाम 5 बजकर 5 मिनट पर उनका निधन हो गया। वाजपेयी जितने अच्‍छे राजनेता और वक्‍ता हैं, उससे कहीं बेहतरीन कवि भी। ‘भारत रत्‍न’ अटल बिहारी वाजपेयी आज जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। ऐसे में उनकी वो कविताएं याद आती हैं, जो पत्‍थरों में भी जान फूंक सकती हैं।

 

कैसा हो घर का वास्तु स्वर्गीय अटल जी की ज़ुबानी – 👍🏻

घर चाहे कैसा भी हो..
उसके एक कोने में..
खुलकर हंसने की जगह रखना..

सूरज कितना भी दूर हो..
उसको घर आने का रास्ता देना..

कभी कभी छत पर चढ़कर..
तारे अवश्य गिनना..
हो सके तो हाथ बढ़ा कर..
चाँद को छूने की कोशिश करना .

अगर हो लोगों से मिलना जुलना..
तो घर के पास पड़ोस ज़रूर रखना..

भीगने देना बारिश में..
उछल कूद भी करने देना..
हो सके तो बच्चों को..
एक कागज़ की किश्ती चलाने देना..

कभी हो फुरसत,आसमान भी साफ हो..
तो एक पतंग आसमान में चढ़ाना..
हो सके तो एक छोटा सा पेंच भी लड़ाना..

घर के सामने रखना एक पेड़..
उस पर बैठे पक्षियों की बातें अवश्य सुनना..

घर चाहे कैसा भी हो..
घर के एक कोने में..
खुलकर हँसने की जगह रखना.

चाहे जिधर से गुज़रिये
मीठी सी हलचल मचा दिजिये,

उम्र का हरेक दौर मज़ेदार है
अपनी उम्र का मज़ा लिजिये.

ज़िंदा दिल रहिए जनाब,
ये चेहरे पे उदासी कैसी
वक्त तो बीत ही रहा है,
उम्र की एेसी की तैसी…!¡! 🔶

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